Saturday, January 31, 2015

किनाराकशी - लघुकथा

(चित्र व लघुकथा: अनुराग शर्मा)
गाँव में दो नानियाँ रहती थीं। बच्चे जब भी गाँव जाते तो माता-पिता के दवाब के बावजूद भी एक ही नानी के घर में ही रहते थे। दूसरी को सदा इस बात की शिकायत रही। बहला-फुसलाकर या डांट-डपटकर जब बच्चे दूसरी नानी के घर भेज दिये जाते तो जितनी देर वहाँ रहते उन्हें पहली नानी का नाम ले-लेकर यही उलाहनाएं मिलतीं कि उनके पास बच्चों को वशीभूत करने वाला ऐसा कौन सा मंत्र है?  ये वाली तो पहली वाली से कितने ही मायनों में बेहतर हैं। यह वाली नानी क्या बच्चों को मारती-पीटती हैं जो बच्चे उनके पास नहीं आते? बच्चे 10-15 मिनट तक अपना सिर धुनते और फिर सिर झुकाकर पहले वाली नानी के घर वापस चले जाते।

हर साल दूसरी नानी के घर जाकर उनसे मिलने वाले बच्चों की संख्या कम होते-होते एक समय ऐसा आया जब मैं अकेला वहाँ गया। तब भी उन्होने यही शिकवा किया कि उनके सही और सच्चे होने के बावजूद भोले बच्चों ने पहली नानी के किसी छलावे के कारण उनसे किनाराकशी कर ली है। उस दिन के बाद मेरी भी कभी उनसे मुलाक़ात नहीं हुई, हाँ सहानुभूति आज भी है।

Monday, January 12, 2015

कंजूस मक्खीचूस - लघुकथा

दिवाली मिलन के समारोह में जब सुरेखा जी मुस्कराती हुई नजदीक आईं तो खुशी के साथ मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। शहर की सबसे धनी और प्रसिद्ध भारतीय डॉक्टर। बड़े-बड़े लोगों से पहचान। बिना अपॉइंटमेंट के एक मिनट की बात भी संभव नहीं और बिना कनेक्शन के अपोइंटमेंट भी संभव नहीं।

अरे इन्हें तो मेरा नाम भी पता है, यह भी मालूम है कि मेरा घर दिल्ली में है और मैं परसों छुट्टी पर भारत जा रहा हूँ। दो मिनट की बातचीत में ही इतनी नजदीकी। लोग यूँ ही इन्हें नकचढ़ा और घमंडी बताते हैं। जलते हैं सब इनकी समृद्धि से। ऐसी सुंदरी को काले दिल वाली और इतनी धनाढ्य होने पर भी एक नंबर की कंजूस मक्खीचूस बताते हैं। जलें, मेरी बला से। मैं तो किसी की बातों में आने से रहा।

समारोह के बाद घर आकर पैकिंग आदि करके सोया तो सुबह देर से उठा। अलसाई नींद में ऐसा लगा था जैसे किसी ने द्वार की घंटी बजाई थी। सोचा, उठकर देख ही लूँ। शायद कोई सचमुच आया ही हो, थक हारकर लौट न गया हो। दरवाजा खोला तो बाहर पोलीथीन का एक बड़ा सा लिफाफा रखा था। साथ में एक नोट भी था।

"बुरा न मानें, अपना समझकर यह हक़ जता रही हूँ। इस पैकेट में कुछ रेशमी साड़ियाँ हैं। आप भारत जा ही रहे हैं। वहाँ से ड्राइक्लीन करवा लाइये, यहाँ तो बहुत महंगा है। वापसी पर बिल के अनुसार भुगतान कर दूँगी।

~ आपकी सुरेखा।"


Wednesday, December 31, 2014

ये बुद्धिजीवी कैसे बनते हैं?

आपको, परिजनों और मित्रों को नववर्ष 2015 के शुभ अवसर पर हार्दिक मंगलकामनाएं

जब फेसबुक पर एक मित्र "ठूँठ बीकानेरी" ने एक सहज सा प्रश्न किया, "ये बुद्धिजीवी कैसे बनते हैं?" तो बहुत से उत्तर आए। उन्हीं जवाबों के सहारे एक अन्य मित्र सतीश चंद्र सत्यार्थी के लिखे लाजवाब लेख "फेसबुक पर इंटेलेक्चुअल कैसे दिखें" तक पहुंच गए। गजब के सुझाव हैं। आप भी एक बार अवश्य पढ़िये।

एक बुद्धिजीवी के रूप में अपना सिक्का कैसे जमाएँ, यह एक शाश्वत समस्या है। जिसका सामना बहुत से इंटरनेटजन अक्सर करते हैं। सत्यार्थी जी का आलेख फेसबुक पर इंटेलेक्चुअल कैसे दिखें" उनके लिए अवश्य सहायक सिद्ध होगा। मेरे अनुभव में आए कुछ सरल बिन्दु यहाँ उल्लिखित हैं। इन्हें उस लेख का सहयोगी या पूरक समझा जा सकता है।

1) नाम
बुद्धिजीवी की पहली पहचान होती है उसका नाम। अपने लिए एक अलग सा नाम चुनें। अच्छा, बुरा, छोटा, बड़ा, चाहे जैसा भी हो, होना अजीबोगरीब चाहिए। वैसे चुनने को तो आप अदरक भी चुन सकते हैं लेकिन उस स्थिति में केवल आपका सब्जीवाला ही आपकी बुद्धिजीविता को पहचान सकेगा। सो आप किसी सब्जी के बजाय रूस, चीन, कोरिया, विएतनाम, क्यूबा आदि के किसी खूनी क्रान्ति मिथक के किसी पात्र को चुन सकते हैं। जितना भावहीन पात्र हो बुद्धिजीविता उतनी ही बेहतर निखरेगी। अगर आप शुद्ध देसी नाम ही चलाना चाहते हैं तो भी अपने ठेठ देसी नाम राम परसाद, या चंपत लाल की जगह युद्ध, समर, रक्त, बारूद, विप्लव, सर्वनाश, प्रचंड, तांडव, प्रलय आदि कुछ तो ऐसा कर ही लीजिये जिससे आपके भीरु स्वभाव की गंध आपकी उद्दंडता के पीछे छिप जाये।

2) उपनाम
वैसे तो खालिस बुद्धिजीवी एकल नामधारी ही होता है। लेकिन यदि आप एकदम से ऊपर के पायदान पर बैठने में असहज (या असुरक्षित) महसूस कर रहे हों तो आरम्भ में अपना मूल नाम चालू रख सकते हैं। केवल एक उपनाम की दरकार है। वह भी न हो तो अपना कुलनाम ही किसी ऐसे नाम से बदल लीजिये जो क्रांतिकारी नहीं तो कम से कम परिवर्तनकारी तो दिखे। नाम अगर अङ्ग्रेज़ी के A अक्सर से शुरू हो तो किसी भी सूची में सबसे ऊपर दिखाई देगा। इसलिए सबसे आसान काम है किसी भी आदरणीय शब्द से पहले अ या अन चिपका दिया जाय। आजकल के ट्रेंड को देखते हुए अभारतीय, असंस्कृत, अनादर, अनार्य, अद्रविड़, अहिंदू, अब्राह्मण, और अशूर के काफी हिट होने की संभावना है। यदि ऐसा करना आपको ठीक न लगे तो बुद्धिजीवी से मिलता जुलता कोई शब्द चुनें, यथा: लेखजीवी, पत्रजीवी, परजीवी, तमजीवी, स्याहजीवी, कम्प्यूटरजीवी, कीबोर्डजीवी, व्हाट्सऐपजीवी आदि। यकीन मानिए, आधे लोग तो आपकी इस "GV" चाल से ही चित्त हो जाएँगे।

3) संघे शक्ति कलयुगे
कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। सो बुद्धिजीवी बनाने के लिए मूर्खों की सहायता लीजिये। उनको अपने साथ मिलाकर दूसरों के फटे में टांग अड़ाने के सामूहिक प्रयोग आरम्भ कीजिये। मिलजुलकर एक संस्था रजिस्टर करवा लीजिये जिसके आजीवन अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, सचिव, व्यवस्थापक आदि सब आप ही हों। संस्था का नाम रचने के लिए अपने नाम से पहले प्रगतिशील, प्रोग्रेसफील, या तरक्कीझील जोड़ लीजिये। मसलन "तरक्कीझील सूखेलाल विरोध मंच"। यदि अपना नाम जोड़ने से बचना चाहते हैं तो किसी गरम मुद्दे को नाम में जोड़ लीजिये, यथा आतंक सुधार दल, नारीमन पॉइंट हड़ताल संघ, अनशन-धरना प्रोत्साहक मुख्यमंत्री समिति, सर्वकाम दखलंदाज़ी संगठन, लगाई-बुझाई समिति आदि। यदि आपको छोटा सा नाम चुनना है तो रास्ते के रोड़े जैसा कोई नाम चुनिये, प्रभाव पड़ेगा, लोग डरेंगे, उदाहरण: स्पीडब्रेकर, रोक दो, प्रतिरोध, गतिरोध, सड़क का गड्ढा, बारूदी सुरंग आदि। और यदि आपको ये सारे नाम पुरातनपंथी लगते हैं तो फिर चुनिये एक आक्रामक नाम, जैसे: पोलखोल, हल्लाबोल, पर्दाफाश, अंधविरोध, पीट दो आदि।

4) कर्मण्येवाधिकारस्ते 
अब संस्था बनाई है तो कुछ काम भी करना पड़ेगा। रोजाना दो-तीन बयान दीजिये। ओबामा ने आज पान नहीं खाया, यह बंगाल के पान-उत्पादक किसानों का अपमान है, आदि-आदि। अखबारों में आलेख भेजिये। आलेख न छपें तो पत्र लिखिए। पत्र भी न छपें तो अपने फेसबुक प्रोफाइल पर विरोध-पत्र पोस्ट कीजिये और अपने मित्रों से लाइक करवाइए। पड़ोस के किसी मंदिर, गुरुद्वारे, स्कूल, सचिवालय, थाने, अस्पताल आदि पहुँचकर अपने मोबाइल से वहाँ के हर बोर्ड का फोटो खींच लीजिये और बैठकर उनमें ऐसे चिन्ह ढूंढिए जिनपर विवाद ठेला जा सके। कुछ भी न मिले तो फॉटोशॉप कर के विवाद उत्पन्न कर लीजिये। मंदिर के उदाहरण में "गैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित है" टाइप का कुछ भी लिखा जा सकता है। बहुत चलता है। बाकी तो आप खुद ही समझदार हैं, जमाने की नब्ज़ पहचानते हैं।

5) जालसाज़ी
ये जालसाज़ी वो वाली नहीं है जो नोट छापती है, ये है नेटवर्किंग। संस्था तो आप बना ही चुके हैं। सामाजिक चेतना के नाम पर थोड़ा बहुत चन्दा भी इकट्ठा कर ही लिया होगा। अब उस चंदे के प्रयोग से नेटवर्किंग का बाम मलिए और प्रगति के काम पर चलिये। ऐसे लोगों की सूची बनाइये जो आपके काम भी आ सकते हों और थोड़े लालची किस्म के भी हों। इनमें घंटाध्वनि प्रतिष्ठान के मालिक भी हो सकते हैं, बुझाचिराग के संपादक भी, सर्वहर समिति के अध्यक्ष भी, तंदूरदर्शन टीवी चैनल के प्रोड्यूसर भी और आसपड़ोस के अभिमानी और भ्रष्ट नौकरशाह भी। एक सम्मान समारोह आयोजित करके एक लाइन में सबको सम्मान सर्टिफिकेट बाँट दीजिये। अगर आपका चन्दा अच्छा हुआ है तो समारोह के बाद पार्टी भी कीजिये, हफ्ते भर में किरपा आनी शुरू हो जाएगी।

6) आत्मनिर्भरता 
इतने सब से भी अगर आपका काम न बने तो फिर आपको आत्मनिर्भर होना पड़ेगा। अपना खुद का एक टीवी चैनल, या पत्रिका या अखबार निकालिए। सबसे आसान काम एक न्यूज़ चैनल चलाने का है। तमाम अखबार पढ़कर सामग्री बनाइये और अपने इन्टरनेट कैफे में चाय लाने वाले लड़कों को टाई लगाकर बैठा दीजिये कैमरे के सामने - 3 मिनट में 30 और 5 मिनट में 500 खबरें जैसे कार्यक्रमों में। 8 मिनट तो ये हुये। 24 घंटों का बाकी काम हर मर्ज की दावा हकीम लुक़मान टाइप के विज्ञापनों से चल जाएगा। फिर भी जो एक घंटा बच जाये उसके बीच में आप अपनी बुद्धिजीवी विशेषज्ञता के साथ आजकल के हालात पर तसकरा कीजिये। पेनल के लिए पिछले कदम में सम्मानित लोगों में से कुछ को बारी-बारी से बुलाते रहिए। बोलने में घबराये मत। चल जाये तो ठीक और अगर कभी लेने के देने पड़ जाएँ तो बड़प्पन दिखाकर बयान वापस ले लीजिये। टीवी पर रोज़ किसी न किसी गंभीर विषय पर लंबी-लंबी फेंकने वाला तो बुद्धिजीवी होगा ही। और फिर जनहित में हर हफ्ते अपना कोई न कोई बयान वापस लेने वाला तो सुपर-बुद्धिजीवी होना चाहिए।

... तो गुरु, हो जा शुरू, जुट जा काम पर। और जब बुद्धिजीवी दुकान चल निकले तो हमें वापस अपना फीडबैक दीजिये।

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