Thursday, December 29, 2016

राजनीतिक प्रश्नोत्तरी - व्यंग्य

बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री जीतन राम मांझी ने कहा, "दलित दारू पीना नहीं छोड़ सकते तो उसे दवा की तरह पियें" (स्रोत: एक पुरानी खबर)

आइये ज़रा देखें इस कथन के जवाब में आए कुछ काल्पनिक महापुरुषों के सटीक बयान

मोदी गोरमींट आने के 100 घंटे में सरकारी शराब की दुकानों में ताले पड़ जाएँगे - बाबा कामदेव

लिकर इंडिया की समस्या है, हिंदूस्थान में तो दूध घी और मृत संजीवनी सुरा की धाराएँ बहती हैं - श्री आवभगत जी

हमारी किताब में ही नहीं, आपके ग्रन्थों में भी अल्कोहल मना है - हम शराब की सब दुकानें और आयुर्वेद की सब फेक्टरी बंद करा देंगे। आम के बाग जलाकर खजूर उगाना ज़रूरी कर देंगे  - हकीम अक्सर जमालघोटा

ये जो स्कॉच है, ये आपको पता नहीं होगा, हमारे देश में बनती थी, छिपकली और कॉकरोच से। तब इसे छिरोच कहते थे। सन् 1234 में सर वाल्टर स्कॉट उसका फार्मूला चुराकर जर्मनी ले गया था। तब से ये स्कॉच कहलाने लगी - वीडियो प्रवचन महाराज सुपरशिक्षित

अगर ये आरोप सही साबित हो जाएँ कि मेरी पार्टी में शराब की नदी बहती है तो चोरी गई बावली भैंस की कसम, मुझे चोरमीनार पर फांसी लटका दिया जाये - कम खा रामपुरी

ये बयान अल्पसंख्यकों पर अत्याचार है। शराब को बढ़ावा देने वाली बात भगवा आतंकवाद का उदाहरण है। हम राहुल जी से निवेदन करेंगे कि हमें फिर से मुख्यमंत्री बनाया जाये ताकि हम बासा आराबाम को करोड़ों की सरकारी ज़मीन एक रुपये में दे दें - न बाबा न बाबा पिछवाड़े बुड्ढा खाँसता

शराब बुरी बात है। चाय भी बुरी बात है। हम भी इसी देस के नागरिक हैं। चाय बनाना भी बुरी बात है और चाय पिलाना भी। खबरदार, चायवालों से होसियार, खरीदिए लौकी का अचार, इस बार, हर बार - अचार और मिशन

शराब तो पीनी ही चाहिए। लाल रंग की हो तो बहुत बढ़िया, रेड वाइन वगैरा। शराब बंद हो जाएगी तो हमारी पार्टी की तो पार्टियां ही बंद हो जाएंगी. क्रांति की धार वोदका की बोतल से शुरू होती है. लिक़र के बिना हमारे नौजवान कहाँ जाएँगे? शराब पिये बिना उन्हें बम फोड़ना कौन सिखाएगा - कामरेड पी के लालबुझक्कड़

शराब रात में पीने की चीज़ है। दिन में हम दूध पीता हूँ। आप भी पीजिए न, हमारी डेरी से खरीदकर - चारा खा लूँ परसाद

अगर स्टिंग ऑपरेशन करने में मुश्किल आये तो शराब पिलाकर आसानी से करें। लेकिन हमारे विधायकों को बख्श दें। सदन से ज़्यादा तो पहले ही जेल में पडे रहते हैं - हरीश्चंद पछाड ईमानवाल

70 साल से रिज़र्व बैंक ने नोट छापे, गरीब लोग उन नोटों से शराब खरीदकर पीते हैं और रोते हैं. मित रो, अब मत रो, हम नया गवर्नर लाकर पुराने नोट छपना बंद करा देंगे, जेब में 11 नोट रखकर चलना गैरकानूनी होगा. घर में 15 से ज़्यादा नोट रखने के लिये लाइसेंस लेना पडेगा. कार्ड स्वाइप मशीन लिये बिना चौराहे पर घूमते भिखारियों को पकडकर जेल भेज दिया जायेगा मित रो. हर सुबह एक समोसा और एक चाय खरीदने के लिये दो-दो हज़ार के नोट लेकर आने वाले  40-50 ग्राहकों के लिये भी पर्याप्त छुट्टा न रखने वाले दुकानदारों के कर की दर, बदर कर दी जायेगी. - प्रमुखयात्रामंत्री

शराब पीते पकडे जाने वालों के लिये ऑनलाइन परमिट की व्यवस्था की गई है, कैशलैस रिश्वत के लिये घूसटीएम ऐप डाउनलोड करें, विकासमार्ग पर चलें  - केशकर्तन मंत्रालय

[व्यंग्य जारी रहे]

Tuesday, November 22, 2016

स्वप्न - एक कविता

ये स्वप्न कहाँ ले जाते हैं
ये स्वप्न कहाँ ले जाते हैं

सच्चे से लगते कभी कभी
ये पुलाव खयाली पकाते है

सपने मनमौजी होते हैं
कोई नियम समझ न पाते हैं

ज्ञानी का ज्ञान धरा रहता
अपने मन की कर जाते हैं

सब कुछ कभी लुटा देते
सर्वस्व कभी दे जाते हैं

ये स्वप्न कहाँ से आते हैं
ये स्वप्न कहाँ से आते हैं

पिट्सबर्ग की एक सपनीली सुबह



Thursday, November 10, 2016

मोड़ - लघुकथा

चित्र: अनुराग शर्मा
लाइसेंस भी नहीं मिला और एक दिन की छुट्टी फिर से बेकार हो गई। एक बार पहले भी उसके साथ यही हो चुका है। परिवहन विभाग का दफ़्तर घर से दूर है। आने-जाने में ही इतना समय लग जाता है। उस पर इतनी भीड़ और फिर बाबूजी के नखरे। अभी किसी से बात कर रहे हैं, अब खाने का वक़्त हो गया।

पिछली बार के टेस्ट में इसलिये फ़ेल कर दिया था कि उसने स्कूटर मोड़ते समय इंडिकेटर दे दिया था, तब बोले कि हाथ देना चाहिये था। इस बार उसने हाथ दिया तो कहते हैं कि इंडिकेटर देना चाहिये था।

भुनभुनाता हुआ बाहर आ रहा था कि एक आदमी ने उसे रोक लिया, "लाइसेंस चाहिये?"

उसने ध्यान से देखा, आदमी के सर के ठीक ऊपर दीवार पर लिखा था, "दलालों से सावधान।"

"नहीं, नहीं, मुझे लाइसेंस नहीं चाहिये ... "

"तो क्या यहाँ सब्ज़ी खरीदने आए थे? अरे यहाँ जो भी आता है उसे लाइसेंस ही चाहिये, चलो मैं दिलाता हूँ।"

कुछ ही देर में वह मुस्कुराता हुआ बाहर जा रहा था। उसे पता चल गया था कि मुड़ते समय न हाथ देना होता है न इंडिकेटर, सिर्फ़ रिश्वत देना होता है।


(अनुराग शर्मा

Tuesday, October 25, 2016

अनंत से अनंत तक - कविता

(अनुराग शर्मा)

जीवन क्या है एक तमाशा
थोडी आशा खूब निराशा

सब लीला है सब माया है
कुछ खोया है कुछ पाया है

न कुछ आगे न कुछ पीछे
कुछ ऊपर ही न कुछ नीचे

जो चाहे वो अब सुन कहले
उस बिन्दु से न कुछ पहले

उस बिन्दु के बाद नहीं कुछ
होगा भी तो याद नहीं कुछ

जो कुछ है वह सभी यहीं है
जितना सुधरे वही सही है.
सेतु हिंदी काव्य प्रतियोगिता में आपका स्वागत है, संशोधित अंतिम तिथि: 10 नवम्बर, 2016

Tuesday, September 13, 2016

ये दुनिया अगर - कविता

(अनुराग शर्मा)

बारूद उगाते हैं बसी थी जहाँ केसर
मैं चुप खड़ा कब्ज़े में है उनके मेरा घर

कैसे भला किससे कहूँ मैं जान न पाऊँ
दे न सकूँ आवाज़ मुझे जान का है डर

नक्सल कहीं माओ कहीं बैठे हैं जेहादी
कंधे बड़े लेकिन नहीं दीखे है कहीं सर

कोई अमल होता नहीं बेबस हुआ हाकिम
दर पे तेरे पटक के ये सर जायेंगे हम मर

बदलाव कभी आ नहीं सकता है वहाँ पे
परचम बगावत का हुआ चोरी जहाँ पर

Wednesday, September 7, 2016

शाब्दिक हिंसा - मत करो (कविता)

लोग अक्सर शाब्दिक हिंसा की बात करते हुए उसे वास्तविक हिंसा के समान ठहराते हैं. फ़ेसबुक पर एक ऐसी ही पोस्ट देखकर निम्न उद्गार सामने आये. शब्दों को ठोकपीट कर कविता का स्वरूप देने के लिये सलिल वर्मा जी का आभार. (अनुराग शर्मा)

मत करो
मत करो तुलना
कलम-तलवार में
और समता
शब्द और हथियार में
ताण्डव करते हुये हथियार हैं
शब्द पीड़ा शमन को तैयार हैं

कुछ बुराई कर सके
अपशब्द माना
वह भी तभी जब
मैं समझ पाऊँ
गिरी भाषा तुम्हारी
और कमज़ोरी मेरी
आहत मुझे कर दे ज़रा
कुछ भी कहो
सामान्यतः
इस शब्द ने है
दर्द अक्सर ही हरा

लेकिन तुम्हारी
आईईडी, बम, और बरसती गोलियाँ
इनसे भला किसका हुआ
हर कोई बस इससे मरा
नारी-पुरुष, आबाल-वृद्ध
कोई नहीं है बच सका
जो सामने आया
वही जाँ से गया

शब्द और हथियार की तुलना
तो केवल बचपने की बात है
कुछ ग़ौर से सोचें तनिक तो
ये किन्हीं हिंसक दलों की
इक गुरिल्ला घात है

इनके कहे पर मत चलो तुम
वाद या मज़हब,
किसी भी बात पर
इनका हुकुम मानो नहीं तुम
छोड़कर हिंसा को ही
संसार यह आगे बढ़ा है
नर्क तल में और हिम ऊपर चढ़ा है
बस चेष्टा इतनी करो
हिंसा से तुम बचकर रहो
जब भी कहो, जैसा कहो, बस सच कहो
और धैर्य धर सच को सहो

शब्द से उपचार भी सम्भव है जग में
प्रेम तो नि:शब्द भी करता है अक्सर
फिर भला नि:शस्त्र होना
हो नहीं सकता है क्यों
पहला कदम इंसानियत के नाम पर
कर जोड कर
कर लो नमन, हथियार छोड़ो
अग्नि हिंसा की बुझाने के लिये तुम
आज इस पर बस ज़रा सा प्रेम छोड़ो!

Sunday, August 21, 2016

शिकायत - कविता

मुद्रा खरी खरी
कहती है
खोटे सिक्के चलते हैं

सांप फ़ुंकारे
ज़हर के थैले
क्यों उसमें पलते हैं

पांव दुखी कि
बदन सहारे
उसके ही चलते हैं

आग खफ़ा हो
जाती क्योंकि
उससे सब जलते हैं

(अनुराग शर्मा)

Saturday, July 30, 2016

हुतात्मा ऊधमसिंह उर्फ सरदार शेरसिंह

अमर शहीद ऊधमसिंह का जन्म सन् 26 दिसम्बर, 1899 में पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम ग्राम में हुआ था। उनके पिता सरदार टहल सिंह निकट के उपाल गाँव के रेलवे क्रासिंग पर चौकीदारी करते थे। उनका जन्म का नाम शेरसिंह था। उनके जन्म के दो वर्ष बाद ही उनकी माँ और फिर सन् 1907 में उनके पिता दिवंगत हो गए। अनाथ शेरसिंह को लेकर उनके बड़े भाई मुक्ता सिंह उर्फ साधू सिंह ने अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण ली। अनाथालय में रहते हुए सन् 1917 में बड़े भाई साधुसिंह के देहांत के बाद सरदार शेरसिंह अपनी पारिवारिक बंधनों से पूर्णतया स्वतन्त्र हो गए। शेरसिंह ने 1918 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।

शेरसिंह के बाल्यकाल और किशोरावस्था के समय में भारतीय मानस में स्वतन्त्रता की आग तेज़ी से धधक रही थी। जिसे अंग्रेजों की क्रूरता बारंबार हवा दे रही थी। 13 अप्रैल 1919 में जलियाँवाला बाग़ के वैशाखी समारोह में खालसा अनाथालय के अन्य बच्चों के साथ शेरसिंह भी सेवा करने गए थे। उसी दिन बाद में जनरल डायर (Brigadier General Reginald Edward Harry Dyer) द्वारा निहत्थे निर्दोषों को गोलियों से भून दिया गया था। जालियाँवाला बाग के जघन्य हत्याकांड के बाद रात में शेरसिंह पुनः घटनास्थल पर गये और वहाँ की रक्तरंजित मिट्टी माथे से लगाकर इस काण्ड का बदला लेने की प्रतिज्ञा की।

क्रांतिकारी आन्दोलन अपने चरम पर था। सन् 1920 में शेरसिंह अफ्रीका पहुंचे और 1921 में नैरोबी के रास्ते संयुक्त राज्य अमेरिका जाने का प्रयास किया परंतु असफल होने पर वापस भारत लौट आये और विदेश जाने का प्रयास करते रहे। 1924 में वे अमरीका पहुच गए और वहाँ सक्रिय ग़दर पार्टी में शामिल हो गए। 1927 में वे 25 साथियों और असलाह के साथ चन्द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह का साथ देने भारत आये। भारत लौटने के कुछ समय बाद उन्हें शस्त्र अधिनियम के उल्लंघन के लिए गिरफ्तार कर लिया गया। अक्तूबर सन् 1931 में वे अमृतसर जेल से छूटे। इस बीच में भारत के क्रांतिकारी परिदृश्य में एक बड़ा भूचाल आ चुका था। उस समय तक स्वाधीनता आंदोलन के कई बड़े नाम चन्द्रशेखर आज़ाद, भाई भगवतीचरण, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव आदि मृत्यु का वरण कर चुके थे। अमृतसर इस घटना के बाद उन्होंने अमृतसर में साईन बोर्ड पेंट करने की दुकान चलायी जब पहली बार उन्होने अपना नाम "राम मोहम्मद सिंह आजाद" लिखवाया। एक धर्मनिरपेक्ष भारत की भावना का यह एक क्रांतिकारी उद्गार था।

31 जुलाई 1992 को जारी टिकट 
शेरसिंह के नाम से पुलिस रिकार्ड होने के कारण सन् 1933 में अपने नए नाम ऊधमसिंह के साथ आव्रजन का पुनर्प्रयास करके वे जर्मनी पहुचे। फिर इटली, फ़्रांस, स्वित्ज़रलैंड और आस्ट्रिया होते हुए 1934 में इंग्लैंड पहुंच गए। जनरल डायर से बदला लेने का उनका सपना अधूरा ही रहा क्योंकि वह 23 जुलाई, 1927 को आत्महत्या कर चुका था। लेकिन जलियाँवाला हत्याकांड का आदेश देने वाला, पंजाब का तत्कालीन लेफ़्टीनेंट गवर्नर माइकेल ओड्वायर (Lieutenent Governor Michael O' Dwyer) अभी जीवित था। 1912 से 1919 तक पंजाब के गवर्नर रहे ओड्वायर ने जालियाँवाला हत्याकांड को सही ठहराया था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जालियाँवाला हत्याकांड ओड्वायर के क्रूर मस्तिष्क की उपज था जिसके लिए उसने डायर को नियुक्त किया था।

ब्रिटेन पहुँचकर वे लंडन में किराये पर रहते हुए माइकल ओड्वायर को मारने का अवसर ढूँढने लगे जो उन्हें 13 अप्रैल 1940 में मिला। कैक्सटन हाल में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी के संयुक्त समारोह में ओड्वायर को बोलने आना था। इस सभा में ऊधम सिंह एक पिस्तौल को किताब में छुपाकर पहुँच गए और मंच पर उपस्थित ओड्वायर और उसके साथ उपस्थित सर लूइस, लार्ड लेमिंगटन और भारत के तत्कालीन सचिव लार्ड जेटलैंड पर गोलियां चलाईं। ओड्वायर घटनास्थल पर ही मारा गया जबकि लुईस, लेमिंगटन और जेटलैंड घायल हुये। ऊधमसिंह भागे नहीं, उन्हें घटनास्थल पर ही गिरफ्तार कर लिया गया।

1 अप्रैल 1940 को ऊधमसिंह पर औपचारिक रूप से हत्या का अभियोग लगाया गया। ऊधमसिंह ने आरोपों को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होने कहा मैं अपनी मातृभूमि के लिए मरूँ, इससे बढ़कर मेरा सौभाग्य क्या होगा। इस स्पष्ट अभियोग में ऊधमसिंह को मृत्युदंड सुनाया गया और 31 जुलाई 1940 को पेण्टनविल जेल में फांसी दे दी गयी। उन्हें उसी दिन जेल के अहाते में ही दफना दिया गया।

सत्तर के दशक में ऊधमसिंह के अवशेषों को भारत वापस लाने की मुहिम शुरू हुई। भारत सरकार के विशेष दूत के रूप में सुल्तानपुर लोधी के विधायक सरदार साधू सिंह थिंड ब्रिटेन गए। 19 जुलाई, 1974 को ऊधमसिंह के भस्मावशेषों को भारत लाया गया। पाँच दिन उन्हें सुनाम ग्राम में जनता के दर्शनार्थ रखने के बाद उनका दाह संस्कार हुआ और राख को सम्मान सहित सतलज और हरिद्वार की गंगा में प्रवाहित कर दिया गया।

31 जुलाई 1992 को भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाकटिकट भी जारी किया।


Saturday, July 23, 2016

23 जुलाई लोकमान्य बाल गंगाधर टिळक

लोकमान्य के नाम से प्रसिद्ध नेता बाल गंगाधर टिळक का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले में हुआ था. वे एक विद्वान गणितज्ञ और दर्शन शास्त्री होने के साथ-साथ महान देशभक्त भी थे. ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता की नींव रखने वाले महापुरुषों में वे अग्रगण्य थे.

उनके व्याकरणशास्त्री पिता को पुणे में शिक्षणकार्य मिलने पर वे बचपन में ही पुणे आ गये जो बाद में उनकी कर्मभूमि बना.

सन् 1876 में उन्होंने डेकन कॉलेज से गणित और संस्कृत में स्नातक की डिग्री ली और 1879 में वे मुम्बई विश्वविद्यालय से कानून के स्नातक हुए. पश्चिमी शिक्षा पद्धति से शिक्षित लोकमान्य टिळक  पश्चिम के अंधे अनुकरण के विरोधी थे.

उन्होंने पुणे में एक स्कूल आरम्भ किया जो बाद में डिग्री कॉलेज तक विकसित भी हुआ और उनकी राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र भी बना. 1884 में उन्होंने लोकशिक्षा के उद्देश्य से  डेकन एजूकेशन सोसायटी (Deccan Education Society) की स्थापना की. अंग्रेज़ी के महत्व को पहचानकर उन्होंने भारतीयों के अंग्रेज़ी सीखने पर भी विशेष ज़ोर दिया.

जनजागरण के उद्देश्य से उन्होंने मराठी में "केसरी" तथा अंग्रेज़ी में  "मराठा" शीर्षक से समाचारपत्र निकाले. दोनों अखबारों ने जनता को जागृत करते हुए देश में आज़ादी की भावना को प्रखर किया. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें अपने लिये खतरनाक मानते हुए 1897 में पहली बार गिरफ़्तार कर 18 मास जेल में रखा.

टिळक ने 1805 के बंग-भंग का डटकर विरोध किया. विदेशी उत्पादों के बहिष्कार का उनका आंदोलन जल्दी ही राष्ट्रव्यापी हो गया. उनके सविनय अवज्ञा के सिद्धांत को गांधीजी ने भी अपनाया और इस प्रकार सत्याग्रह के बीज पनपे.  

लोकमान्य टिळक एक सजग और तार्किक व्यक्ति थे. कोई भी बात हो वे तर्क नहीं छोडते थे. वे हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे परंतु धार्मिक हिंदू जुलूसों पर मुस्लिम हमले के बारे में उन्होंने 10 सितम्बर 1898 को लिखा:

अगर मुस्लिम नमाज़ के समय हिंदुओं के भजन आदि बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं तो वे ट्रेन, जहाज़ और दुकानों में नमाज़ कैसे पढते हैं? यह कहना गलत है कि नमाज़ के समय मस्जिद के सामने से भजन आदि गाते हुए निकलना अधार्मिक है.

लोकमान्य टिळक का शवदाह पद्मासन में हुआ 
दंगे-फ़साद से पहले हिंदूजन मुहर्रम जैसे उत्सवों में बढ-चढकर भाग लेते थे परंतु हिंदू उत्सवों को अपने घरों में ही सीमित रखते थे. शिवरात्रि, जन्माष्टमी, रामनवमी, रक्षा बंधन हों या गणेश चतुर्थी, हिंदू समाज उन्हें अपने अपने घरों में व्यक्तिगत उत्सव जैसे ही मनाते थे. टिळक ने गणेशोत्सव को भी एक सामाजिक रूप देने का आह्वान किया जिसकी परम्परा आज पूरे महाराष्ट्र में ही नहीं बल्कि बाहर भी एक सुदृढ रूप ले चुकी है.

1895 में पुणे की एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने रायगढ में शिवाजी के स्मारक के पुनर्निर्माण के लिये एक स्मारक कोष की घोषणा की. लेकिन धार्मिक तनाव देखते हुए यह भी याद दिलाया कि समय बदल गया है और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में हिंदू और मुसलमान दोनों ही पिछड रहे हैं. सन् 1916 में  हिंदू मुस्लिम एकता बनाने और अंग्रेज़ों के विरुद्ध साझा संघर्ष चलाने के उद्देश्य से उन्होंने  मुहम्मद अली जिन्नाह के साथ लखनऊ समझौते (Lucknow Pact) पर हस्ताक्षर किये.

लोकमान्य टिळक के हस्ताक्षर

सन् 1907 में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें एक बार फिर गिरफ़्तार कर छह वर्ष तक म्यानमार की माण्डले जेल में रखा जहाँ उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ श्रीमद्भग्वद्गीतारहस्य का लेखन किया. सन् 1893 में उनकी द ओरायन (The Orion; or, Researches into the Antiquity of the Vedas), तथा 1903 में आर्कटिक होम इन द वेदाज़ (The Arctic Home in the Vedas) नामक पुस्तकें प्रकाशित हुईं.

सन् 1914 में उन्होंने भारतीय स्वराज्य समिति (Indian Home Rule League) की स्थापना की और 1916 में उनका प्रसिद्ध नारा "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" प्रसिद्ध हुआ. 1918 में वे लेबर पार्टी से भारत की स्वतंत्रता के लिये सहयोग लेने ब्रिटेन गये.

लोकमान्य टिळक ने आज़ादी की किरण नहीं देखी. उनका देहावसान 1 अगस्त सन् 1920 को मुम्बई में हुआ. महात्मा गांधी ने उन्हें कहा "नव भारत का निर्माता" और नेहरू जी ने उन्हें "भारतीय स्वाधीनता संग्राम का जनक" बताया.


Saturday, June 11, 2016

बिस्मिल का पत्र अशफ़ाक़ के नाम - इतिहास के भूले पन्ने

सताये तुझ को जो कोई बेवफ़ा बिस्मिल।
तो मुंह से कुछ न कहना आह कर लेना।।
हम शहीदाने-वफा का दीनो ईमां और है।
सिजदा करते हैं हमेशा पांव पर जल्लाद।।


मैंने इस अभियोग में जो भाग लिया अथवा जिनको जिन्दगी की जिम्मेदारी मेरे सिर पर थी, उन में से सब से ज्यादा हिस्सा श्रीयुत अशफाकउल्ला खां वारसी का है। मैं अपनी कलम से उन के लिये भी अन्तिम समय में दो शब्द लिख देना अपना कर्तव्य समझता हूं।

अशफ़ाक,

मुझे भली भांति याद है कि मैं बादशाही एलान के बाद शाहजहांपुर आया था, तो तुम से स्कूल में भेंट हुई थी। तुम्हारी मुझसे मिलने की बड़ी हार्दिक इच्छा थी। तुम ने मुझ से मैनपुरी षडयन्त्र के सम्बन्ध में कुछ बातचीत करना चाही थी। मैंने यह समझा कि एक स्कूल का मुसलमान विद्यार्थी मुझ से इस प्रकार की बातचीत क्यों करता है, तुम्हारी बातों का उत्तर उपेक्षा की दृष्टि से दिया था। तुम्हें उस समय बड़ा खेद हुआ था। तुम्हारे मुख से हार्दिक भावों का प्रकाश हो रहा था।

तुम ने अपने इरादे को यों ही नहीं छोड़ दिया, अपने इरादे पर डटे रहे। जिस प्रकार हो सका कांग्रेस में बातचीत की। अपने इष्ट मित्रों द्वारा इस बात का वि्श्वास दिलाने की कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नही, तुम्हारे दिल में मुल्क की खिदमत करने की ख्वाहि्श थी। अन्त में तुम्हारी विजय हुई। तुम्हारी कोशिशों ने मेरे दिल में जगह पैदा कर ली। तुम्हारे बड़े भाई मेरे उर्दू मिडिल के सहपाठी तथा मित्र थे। यह जान कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। थोड़े दिनों में ही तुम मेरे छोटे भाई के समान हो गये थे, किन्तु छोटे भाई बन कर तुम्हें संतोष न हुआ।

तुम समानता के अधिकार चाहते थे, तुम मित्र की श्रेणी में अपनी गणना चाहते थे। वही हुआ? तुम मेरे सच्चे मित्र थे। सब को आश्चर्य था कि एक कटटर आर्य समाजी और मुसलमान का मेल कैसा? मैं मुसलमानों की शुद्धि करता था। आर्यसमाज मन्दिर में मेरा निवास था, किन्तु तुम इन बातों की किंचितमात्र चिन्ता न करते थे। मेरे कुछ साथी तुम्हें मुसलमान होने के कारण कुछ घृणा की दृष्टि से देखते थे, किन्तु तुम अपने निश्चय में दृढ़ थे। मेरे पास आर्यसमाज मन्दिर में आते-जाते थे। हिंदू-मुसलिम झगड़ा होने पर तुम्हारे मुहल्ले के सब कोई तुम्हें खुल्लम खुल्ला गालियां देते थे, काफिर के नाम से पुकारते थे, पर तुम कभी भी उन के विचारों से सहमत न हुये।

सदैव हिन्दू मुसलिम ऐक्य के पक्षपाती रहे। तुम एक सच्चे मुसलमान तथा सच्चे स्वदेश भक्त थे। तुम्हें यदि जीवन में कोई विचार था, तो यही था कि मुसलमानों को खुदा अकल देता कि वे हिन्दुओं के साथ मेल कर के हिन्दोस्तान की भलाई करते। जब मैं हिन्दी में कोई लेख या पुस्तक लिखता तो तुम सदैव यही अनुरोध करते कि उर्दू में क्यों नहीं लिखते, जो मुसलमान भी पढ़ सकें ?

तुमने स्वदेश भक्ति के भावों को भी भली भांति समझाने के लिये ही हिन्दी का अच्छा अध्ययन किया। अपने घर पर जब माता जी तथा भ्राता जी से बातचीत करते थे, तो तुम्हारे मुंह से हिन्दी शब्द निकल जाते थे, जिससे सबको बड़ा आश्चर्य होता था। तुम्हारी इस प्रकार की प्रकृति देख कर बहुतों को संदेह होता था, कि कहीं इस्लाम-धर्म त्याग कर शुद्धि न करा ले। पर तुम्हारा हृदय तो किसी प्रकार से अशुद्ध न था, फिर तुम शुद्धि किस वस्तु की कराते ? तुम्हारी इस प्रकार की प्रगति ने मेरे हृदय पर पूर्ण विजय पा ली। बहुधा मित्र मण्डली में बात छिड़ती कि कहीं मुसलमान पर विश्वास करके धोखा न खाना।

तुम्हारी जीत हुई, मुझ में तुम में कोई भेद न था। बहुधा मैंने तुमने एक थाली में भोजन किये। मेरे हृदय से यह विचार ही जाता रहा कि हिन्दू मुसलमान में कोई भेद है। तुम मुझ पर अटल विश्वास तथा अगाध प्रीति रखते थे, हां ! तुम मेरा नाम लेकर नहीं पुकार सकते थे। तुम तो सदैव राम कहा करते थे। एक समय जब तुम्हें हृदय-कम्प का दौरा हुआ, तुम अचेत थे, तुम्हारे मुंह से बारम्बार राम, हाय राम! के शब्द निकल रहे थे। पास खड़े हुए भाई बान्धवों को आश्चर्य था कि राम, राम कहता है।

कहते थे कि अल्लाह, अल्लाह कहो, पर तुम्हारी राम-राम की रट थी। उसी समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो राम के भेद को जानते थे। तुरन्त मैं बुलाया गया। मुझसे मिलने पर तुम्हें शान्ति हुई,  तब सब लोग राम-राम के भेद को समझे। अन्त में इस प्रेम, प्रीति तथा मित्रता का परिणाम क्या हुआ ? मेरे विचारों के रंग में तुम भी रंग गये। तुम भी एक कट्टर क्रान्तिकारी बन गये।  अब तो तुम्हारा दिन-रात प्रयत्न यही था, कि जिस प्रकार हो सके मुसलमान नवयुवकों मंस भी क्रान्तिकारी भावों का प्रवेष हो सके। वे भी क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दे।

जितने तुम्हारे बन्धु तथा मित्र थे, सब पर तुमने अपने विचारों का प्रभाव डालने का प्रयत्न किया। बहुधा क्रान्तिकारी सदस्यों को भी बड़ा आश्चर्य होता कि मैने कैसे एक मुसलमान को क्रान्तिकारी दल का प्रतिष्ठित सदस्य बना लिया। मेरे साथ तुमने जो कार्य किये, वे सराहनीय हैं! तुम ने कभी भी मेरी आज्ञा की अवहेलना न की। एक आज्ञाकारी भक्त के समान मेरी आज्ञा पालन में तत्पर रहते थे। तुम्हारा हृदय बड़ा विशाल था। तुम्हारे भाव बड़े उच्च थे।

मुझे यदि शान्ति है तो यही कि तुमने संसार में मेरा मुंह उज्जवल कर दिया। भारत के इतिहास में यह घटना भी उल्लेखनीय हो गई, कि अशफाकउल्ला ख़ाँ ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में योग दिया। अपने भाई बन्धु तथा सम्बन्धियों के समझाने पर कुछ भी ध्यान न दिया। गिरफतार हो जाने पर भी अपने विचारों में दृढ़ रहा ! जैसे तुम शारीरिक बलशाली थे, वैसे ही मानसिक वीर तथा आत्मा से उच्च सिद्ध हुए। इन सबके परिणाम स्वरूप अदालत में तुमको मेरा सहकारी ठहराया गया, और जज ने हमारे मुकदमें का फैसला लिखते समय तुम्हारे गले में भी जयमाल फांसी की रस्सी पहना दी।

प्यारे भाई तुम्हे यह समझ कर सन्तोष होगा कि जिसने अपने माता-पिता की धन-सम्पत्ति को देश-सेवा में अर्पण करके उन्हें भिखारी बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को भी देश सेवा की भेंट कर दिया, जिसने अपना तन मन धन सर्वस्व मातृसेवा में अर्पण करके अपना अन्तिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को भी उसी मातृभूमि की भेंट चढ़ा दिया।

असगर हरीम इश्क में हस्ती ही जुर्म है।
रखना कभी न पांव, यहां सर लिये हुये।।

सहायक काकोरी शडयन्त्र का भी फैसला जज साहब की अदालत से हो गया। श्री अशफाकउल्ला खां वारसी को तीन फांसी और दो काले पानी की आज्ञायें हुईं। श्रीयुत शचीन्द्रनाथ बख़्शी को पांच काले पानी की आज्ञायें हुई।

- राम

[Content courtesy: Dr. Amar Kumar; इस प्रामाणिक पत्र के लिये स्वर्गीय डॉ. अमर कुमार का आभार]

Monday, May 30, 2016

दीवाली का पारितोषिक

गर्मियों के दिनों की शाम को पिट्सबर्ग में लॉन में चमकते जुगनू, जम्मू में बिताये मेरे बचपन की याद दिलाते हैं।  बचपन वाकई बहुत खूबसूरत अनुभव है। लेकिन बचपन की भी अपनी समस्यायें हैं। खासकर उन बच्चों के लिये जिन्हें बचपन में एक अपरिचित भाषा-संस्कृति का सामना करना पडे। बरेली से जम्मू जाते समय कुछ ऐसी ही समस्या मेरे साथ पेश आई।

पूरब-पश्चिम रातोंरात जब मगरिब-मशरिक़ हो जाएँ और गुणा-भाग ज़रब-तकसीम। न कोई सहपाठी आपकी भाषा समझे और न ही आप अपने सहपाठियों, यहाँ तक कि अध्यापकों के निर्देश समझ पाएँ तो ज़रा सोचिए आठ साल के एक मासूम छात्र को कितनी कठिनाई का सामना करना पड़ा होगा। बस मेरा यही हाल था जम्मू के विद्यापीठ में।

कला की शिक्षिका की मुझसे क्या दुश्मनी थी ये तो अब याद नहीं लेकिन इतना अभी भी याद है कि वे क्लास में
आते ही मुझे बाहर निकाल देती थीं। आश्चर्य नहीं कि कला प्रतियोगिता में जब अन्य बच्चे ग्रामीण दृश्यावली से
लेकर साड़ी का किनारा तक बहुत कुछ बना रहे थे, मैंने मनुष्य के पाचनतंत्र का चित्रण किया था।

गणित के अलावा अङ्ग्रेज़ी भी एक भयंकर विषय था। टीचर जी जब अङ्ग्रेज़ी को डोगरी प्रभाव वाली उर्दू में पढ़ाते हुए “पीपल काल्ड हिम फादर ऑफ दी नेशन” बोलते थे तो यकीन मानिए गांधीजी नहीं, बरेली वाले घर के दरवाजे पर लगा पीपल ही याद आता था।

जम्मू का रघुनाथ मंदिर, सन् 1928 में
ऐसे में हिन्दी की अध्यापिका का प्रिय छात्र बन पाना बड़ा सहारा था। उनकी कक्षा में कभी “कन्न फड़” का आदेश नहीं मिला जिसका अर्थ कान पकड़ना नहीं बल्कि मुर्गा बनना होता था। उन्हीं ने विद्यापीठ के वार्षिकोत्सव में “वीर बालक” नाटक करने का अवसर दिया।

घर स्कूल से काफी दूर था। सुबह को सीआरपी की स्कूल बस सब बच्चों को शहर लाकर अंकल जी की दुकान पर छोड़ देती थी। जहां से सब अपने-अपने स्कूल पैदल चले जाते थे। विद्यापीठ के लिए एक पहाड़ी पर स्थित हाईकोर्ट परिसर से होकर जाना पड़ता था जो एक भव्य महल का भाग था।

स्कूल के पीछे पहाड़ी के छोर से सैकड़ों फीट नीचे बहती विराट तवी नदी को देखना एक अद्वितीय अनुभव था। नदी को देखने पर जम्मू के अपने पिछले प्रवास के दौरान रणवीर नहर में बहे लड़कों की कहानियाँ आँखों के सामने ऐसे गुजरती थीं, मानो ताज़ा घटना हो। शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती थी, लेकिन फिर भी इंटरवल में पहाड़ी के छोर पर आकर तवी दर्शन करना मेरा रोज़ का रूटीन बन गया था।

दशहरा-दीवाली के सम्मिलित समारोह जम्मू में बड़ी धूमधाम से मनाए जाते थे। जैसे आजकल बहुत से विद्यालयों में क्रिसमस की छुट्टियाँ होती हैं, वहाँ लगभग दो सप्ताह का दीपावली अवकाश होता था। छुट्टी से एक दिन पहले प्राइमरी, मिडल और हाई स्कूल के सभी छात्र-छात्राओं की सम्मिलित सभा बुलाई गई। दो शब्द बोलने के बाद प्रधानाचार्या ने छात्रों को दशहरा और दीवाली के पर्वों पर कुछ बोलने के लिए मंच पर आमंत्रित किया। जब काफी देर तक कोई आगे नहीं आया तो मैं उठा और बड़े-बड़े बच्चों की उस भीड़ में से चलकर मंच तक पहुंचा। मैंने बोलना शुरू किया तो राम-वनवास से लेकर अयोध्या वापसी में नगरवासियों द्वारा दीपों की पंक्तियाँ बनाकर उल्लास मनाने तक जितना कुछ पता था, जम्मू के लिए दुर्लभ शुद्ध हिन्दी में सब कुछ सुना दिया।

बात पूरी करके जब मैं चुपा तो महसूस किया कि हॉल में पूर्ण निस्तब्धता थी। कुछ क्षणों तक किसी को विश्वास ही नहीं हुआ कि वह छोटा सा लड़का इतना कुछ बोल गया था। अचानक शुरू हुई तालियों की गड़गड़ाहट के बीच प्रधानाचार्य ने मुझे गोद में उठाकर पाँच रुपये का नोट पुरस्कार में दिया। मैंने देखा कि कला की शिक्षिका के साथ-साथ गणित और अंग्रेज़ी के आध्यापकगण भी मुझे स्नेह से देख रहे थे।

तब से अब तक कितनी दीवाली मना चुका हूँ, कितने भाषण दिये हैं, कितने ही पुरस्कार मिले हैं लेकिन आज तक उतना बड़ा पारितोषिक नहीं मिला जितना वह पाँच रुपये का नोट था।

Wednesday, March 16, 2016

याद के बाद - कविता

(शब्द व चित्र: अनुराग शर्मा)


क्यों  ऐसी  बातें  करते  हो
ज़ालिम दुनिया से डरते हो

जो आग को देखके राख हुए
क्यों तपकर नहीं निखरते हो

बस एक ही था वह रूठ गया
अब किसके लिये संवरते हो

हर रोज़ बिछड़ जन मिलते हैं
तुम मिलकर रोज़ बिखरते हो

सब निर्भय होकर उड़ते हैं
तुम फिक्र में डूबते तिरते हो

जब दिल में आग सुलगती है
तुम भय की ठंड ठिठुरते हो

इक बार नज़र भर देखो तो
जिस राह से रोज़ गुज़रते हो

कल त्याग आज कल पाता है
तुम भूत में कितना ठहरते हो


Saturday, February 27, 2016

भूत, पिशाच और राक्षस - देवासुर संग्राम 8



इस शृंखला की पिछली कड़ियों में हमने देव और असुर के सम्बंध को समझने का प्रयास किया, देवताओं के शास्त्रीय लक्षणों की चर्चा की, और सुर और असुर के अंतर की पडताल की है। देव, देवता, और सुर जैसे शब्दों के अर्थ अब स्पष्ट हैं लेकिन लोग अक्सर असुर, दैत्य, दानव, राक्षस और पिशाच आदि शब्दों को समानार्थी मानते हुए जिस प्रकार उनका प्रयोग शैतानी ताकतों के लिये ही करते हैं, वह सही नहीं है। इन सभी शब्दों में सूक्ष्म लेकिन महत्त्वपूर्ण अंतर हैं। असुर शब्द तो सम्माननीय ही है और जैसा कि हमने पिछली कड़ियों में देखा, असुर तो सुरों के पूर्वज ही हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो सुर असुर की ही एक विकसित शाखा हैं। आइये आगे बढने से पहले आज तीन सम्बंधित शब्दों भूत, पिशाच और राक्षस पर दृष्टिपात करते हैं।

भूत 
सर्वभूत, या पंचभूत जैसे शब्दों में मूलतत्व की भावना छिपी है। संसार में जो कुछ भी दृष्टव्य है वह इन्हीं भूतों से बना है. भौतिक शब्द, भूत से ही सम्बंधित है। शरीर का भौतिक स्वरूप है लेकिन उसमें जीवन का संचरण हमें वास्तविक स्वरूप देता है। प्राणांत के बाद केवल देह यानि भौतिक तत्व अर्थात पंचभूत (या मूलभूत) ही बचते हैं. तो भूत का सामान्य अर्थ मृतक से ही लिया जाना चाहिये। जो अब जीवित नहीं है, वह भूतमात्र रहा है। शायद इसी कारण से केवल प्राणी ही नहीं, काल के प्रयोग में भी भूत अतीत को भी दर्शाता है। वर्तमान से अलग, विगत ही भूत है, जो था परंतु अब नहीं है

पिशाच
अंग्रेज़ी में अतीत के लिये एक शब्द है, पास्ट (past). संस्कृत का पश्च भी उसी का समानार्थी है। भारत को विश्वगुरु कहा जाता है तो उसके पीछे यह भावना है कि भारत ने हज़ारों वर्ष पहले समाज को ऐसे क्रांतिकारी कार्य सफलतापूर्वक कर दिखाये जिन्हें अपनाने के लिये शेष विश्व आज भी संघर्ष कर रहा है। समाज के एक बडे वर्ग को अहिंसक बनाना. कृषिकर्म, शाकाहार की प्रवृत्ति, अग्नि द्वारा अंतिम संस्कार, शर्करा की खोज, लहू में लौह के होने की जानकारी सहित उन्नत धातुकर्म, अंकपद्धति, गणित, तर्क, ज्योतिष, हीरे जैसे रत्न को शेष विश्व से परिचित कराना आदि कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो भारतीय संस्कृति को विश्व की अन्य संस्कृतियों से अलग धरातल पर रखते हैं। स्पष्ट है कि यह समाज अपने समकालीनों से कहीं उन्नत थी। अहिंसक जीवनशैली का प्रकाश आने के बाद भी हमारे आस-पडोस के जो पिछडे समुदाय उस नए क्रांतिकारी दौर को न अपना सके, पिशाच (पश्च past पिछला, पिछड़ा) कहलाए। वैसे ही ‪देवनागरी‬ जैसी उन्नत ‪लिपि‬ के आगमन के समय जो लिपियाँ पश्च (past) हो गईं, ‪पैशाची‬ कहलाईं। कई पैशाची प्रचलन से बाहर हो गईं, कई आज भी मूल/परवर्धित रूप में जीवित हैं। पिशाच या पैशाची कोई भाषा, जाति, नस्ल या क्षेत्र नहीं, पिछडेपन का तत्सम है।

राक्षस
ऋषि पुलस्त्य के दो पौत्र क्रमशः यक्षों व राक्षसों के शासक बने। यक्ष समुदाय भी क्रूर माना गया है परंतु वे अतीव धनवान थे। पूजा-पाठ के अलावा जादू-टोने में विश्वास रखते थे। मनोविलास और पहेलियां पूछना उनका शौक था। सही उत्तर देने पर प्रसन्न होते थे और गलत उत्तर पर क्रूर दण्ड भी देते थे। रक्ष संस्कृति यक्ष संस्कृति से कई मायनों में भिन्न थी। जहाँ यक्ष अक्सर एकाकी भ्रमण के किस्सों में मिलते हैं वहीं रक्ष समूहों में आते हैं। यक्ष मानव समाज में मिलने में कठिनाई नहीं पाते वहीं रक्षगण युद्धप्रिय हैं। यक्षों के आदर्शवाक्य वयम् यक्षामः की तर्ज़ पर राक्षसों का आदर्श वाक्य वयम् रक्षामः था, जोकि उनके बारे में काफ़ी कुछ कह जाता है। वयं रक्षामः से तात्पर्य यही है कि वे अपनी रक्षा स्वयं अपने बलबूते पर करने का दावा कर रहे हैं। वे किसी दैवी सहारे की आवश्यकता नहीं समझते, और वे भौतिक बल को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। राक्षसी विचारधारा के कई समूह रहे होंगे लेकिन ब्राह्मण पिता और दैत्य माता की संतति राक्षसराज रावण द्वारा अपने लंकाधिपति भाई कुबेर से हथियाये लंका में शासित वर्ग सबसे प्रसिद्ध राक्षस समूह बना।

[क्रमशः]

Saturday, January 9, 2016

मेरा दर्द न जाने कोय - कविता

दर्द मेरा न वो ताउम्र कभी जान सके
बेपरवाही यही उनकी मुझे मार गई॥
तेरे मेरे आँसू की तासीर अलहदा है
बेआब  नमक सीला, वो दर्द से पैदा है
सब दर्द तेरे सच हैं सखी, मानता हूँ मैं
औ उनके वजूहात को भी जानता हूँ मैं

पर उनके बहाने से जब टूटती हो तुम
बेवजहा बहुत मुझसे जो रूठती हो तुम

तुम मुझको जलाओ तो कोई बात नहीं है
अपनी उँगलियों को भी तो भूनती हो तुम

ये बात मेरे दिल को सदा चाक किए है
यूँ तुमसे कहीं ज़्यादा मैंने अश्क पिये हैं

मिटने से मेरे दर्द भी मिट जाये गर तेरा
तो सामने रखा है तेरे सुन यह सर मेरा

तेरे दर्द का मैं ही हूँ सबब जानता हूँ मैं
सब दर्द तेरे सच हैं सखी, मानता हूँ मैं