Tuesday, February 28, 2017

फिरकापरस्त - एक कविता

(अनुराग शर्मा)

क्यूबा के कम्युनिस्ट राजवंश का प्रथम तानाशाह
बंदूकों से
उगलते हैं मौत
और जहर
रचनाओं से
जैसे कि जहर और
गोली में बुद्धि होती हो
अपने-पराये का
अंतर समझने की

खुशी से उछल रहे हैं कि
दुश्मनों के खात्मे के बाद
समेट लेंगे उनकी
सारी पूंजी
और दुनिया उनकी
मेहनत से बनी
गिराकर सारे बुत
बताएंगे खुद को खुदा
और बैठकर पिएंगे चुरुट
चलाएँगे हुक्म

समझते नहीं कि जहर
अपने फिरके आप बनाता है
बंदूक की नाल
खुद पर तन जाती है
जब सामने दुश्मन का
कोई चिह्न नहीं बचता
समाचार: अहिंसा का प्रवर्तक भारत झेलता है सर्वाधिक विस्फ़ोट, जेहाद, माओवाद के निशाने पर    

13 comments:

  1. कुंद हो जाती है समझ
    देख कर आज के
    समझदार और
    उनकी समझदारी

    बहुत सुन्दर ।

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  2. बंदूक की नाल
    खुद पर तन जाती है
    जब सामने दुश्मन का
    कोई चिह्न नहीं बचता>.>



    बहुत खूब अनुराग जी ---

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 02-03-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2600 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हास्य लेखक तारक मेहता का निधन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  5. बंदूक की नाल जब दूसरों पर तनी हो तब भी अपनी ही आत्मा का हनन होता है, हिंसा से आज तक कहीं भी कोई स्थायी बदलाव नहीं आया. प्रभावशाली रचना..

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  6. सत्य की अभिव्यक्ति है ... बहुत स्पष्टता के साथ बात रखती हुयी ...
    गोली जब चलती है सर नहीं देखती ... कभी न कभी तो अपना सर भी बीच में आ जाता है ...

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  7. लेकिन ये बात उन्हें कौन समझा सकता है -जड़मति के आगे ब्रह्मा भी विवश हैं.जहाँ विचार वर्जित हों वहाँ अक्ल नहीं चलती .

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  9. बहुत सुंदर, सृजन का हुनर न सीखा न सिखाया किसी ने,
    विध्वंस की ख़ुशी के अतिरिक्त और क्या बचता है इनके जिंदगी में !

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  10. साथॆक प्रस्तुतिकरण......
    मेरे ब्लाॅग की नयी पोस्ट पर आपके विचारों की प्रतीक्षा....

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